एक प्रश्न जो सभी बुद्धिजीवी सोच को निशब्द करता है - वह है:
मैं क्या हूँ और मैं क्यूं हूँ।
कईं रातें बेचैन करवटें बदलती रहीं, कईं शामें चाय की सुर्खियाँ भरती रहीं इसी प्रश्न के कारण । उत्तर जैसे रेगिस्तान का पानी, जितने कदम बढाये उसकी ओर उतना ही दूर पाया उसे अपने होटों से । चारों ओर बचा केवल एक निरार्थक सा एहसास और जीवन चल रहा है एक टीले से दूसरे टीले पर एक बूँद की तलाश में ...
